वैश्विक स्तर पर भारत और चीन के संबंध लंबे समय से रणनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहे हैं। इसी बीच चीन में भारत के राजदूत विक्रम दोरईस्वामी ने दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश को नई दिशा देने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि यदि चीन भारतीय उत्पादों, विशेषकर फार्मास्यूटिकल्स (दवाइयों) के लिए अपना बाजार खोले और भारत में चीनी निवेश को प्रोत्साहित किया जाए, तो इससे दोनों देशों के व्यापक हितों को लाभ मिलेगा और द्विपक्षीय संबंध और मजबूत होंगे।
विश्व शांति मंच (World Peace Forum) के दौरान अपने संबोधन में राजदूत दोरईस्वामी ने कहा कि भारत जिन क्षेत्रों में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बढ़त रखता है, वहां निर्यात बढ़ाने की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं। उनका मानना है कि दोनों देशों के बीच संतुलित व्यापार और आर्थिक सहयोग क्षेत्रीय स्थिरता और विकास के लिए भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
उन्होंने संकेत दिया कि भारत की फार्मास्यूटिकल्स, विनिर्माण और अन्य प्रतिस्पर्धी उद्योगों को यदि चीन के विशाल बाजार तक अधिक पहुंच मिलती है, तो इससे व्यापारिक असंतुलन को कम करने में भी मदद मिल सकती है।
भारत-चीन व्यापार में बढ़ी साझेदारी, लेकिन घाटा भी रिकॉर्ड स्तर पर
वित्तीय वर्ष 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार, चीन अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया है। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 151.1 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है।
हालांकि, बढ़ते व्यापार के साथ भारत के लिए एक बड़ी चुनौती भी बनी हुई है। आंकड़ों के मुताबिक, चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा बढ़कर 112.16 अरब डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया है। इसका अर्थ है कि भारत चीन से कहीं अधिक आयात कर रहा है, जबकि भारतीय निर्यात अपेक्षाकृत कम है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि चीन भारतीय उत्पादों के लिए अपने बाजार में अधिक अवसर उपलब्ध कराता है और निवेश सहयोग को संतुलित तरीके से आगे बढ़ाया जाता है, तो दोनों देशों के बीच व्यापारिक असंतुलन को कम करने की दिशा में सकारात्मक प्रगति हो सकती है।#IndiaChina #VikramDoraiswami #Trade #China #India #Pharmaceuticals #Investment #Economy #WorldNews #InternationalNews








