भारत में चुनाव आयोग और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के बीच 400 से अधिक भारतीय मूल के छात्रों, शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों और पूर्व छात्रों ने एक संयुक्त बयान जारी किया है। अमेरिका के MIT, ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड और हार्वर्ड समेत कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से जुड़े इन लोगों ने विरोध प्रदर्शनों के जरिए लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाने को लेकर चिंता जताई है। यह बयान 27 देशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों की ओर से जारी किया गया है।
‘स्पेयर इंडिया फ्रॉम एनार्की’ यानी ‘भारत को अराजकता से बचाएं’ शीर्षक वाले इस बयान में हस्ताक्षरकर्ताओं ने कहा कि लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर ऐसी गतिविधियां नहीं होनी चाहिए, जिनसे संवैधानिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में जनता का विश्वास कमजोर हो। उनका कहना है कि राजनीतिक मतभेदों को सड़कों पर टकराव के बजाय संवैधानिक दायरे में चर्चा और संवाद के जरिए सुलझाया जाना चाहिए।
हस्ताक्षरकर्ताओं ने संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए संवैधानिक तरीकों के प्रति प्रतिबद्ध रहने की अपील की। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने के लिए बहस, चर्चा, संवाद और लोकतांत्रिक विरोध के रास्ते अपनाए जाने चाहिए।
यह बयान ऐसे समय में आया है, जब भारत में चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर विपक्षी दल लगातार सवाल उठा रहे हैं। विपक्षी नेताओं ने मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं और नामों को हटाए जाने को लेकर आपत्ति जताई है। वहीं, चुनाव आयोग का कहना है कि SIR मतदाता सूची को अपडेट करने की प्रक्रिया है।
संयुक्त बयान में किसी एक राजनीतिक दल या विशिष्ट विरोध प्रदर्शन का नाम नहीं लिया गया है। हालांकि, इसकी टाइमिंग को चुनाव आयोग के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों और SIR को लेकर जारी राजनीतिक बहस से जोड़कर देखा जा रहा है।
शिक्षाविदों ने यह भी कहा कि चुनावी नतीजों, न्यायिक फैसलों और संवैधानिक संस्थाओं को लेकर मतभेद होने पर समाधान संवैधानिक व्यवस्था के भीतर तलाशना चाहिए। उनके मुताबिक, लोकतंत्र में असहमति महत्वपूर्ण है, लेकिन असहमति व्यक्त करने के तरीके भी लोकतांत्रिक और संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप होने चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, SIR और विरोध प्रदर्शनों को लेकर राजनीतिक बहस जारी है। एक तरफ विपक्ष चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग कर रहा है, वहीं संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर करने वाले शिक्षाविदों ने संवैधानिक संस्थाओं में भरोसा बनाए रखने और मतभेदों को लोकतांत्रिक तरीकों से सुलझाने पर जोर दिया है।
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