भारत और चीन के बीच सांस्कृतिक तथा बौद्ध विरासत से जुड़े संबंधों को नई मजबूती मिलने जा रही है। चीन से बौद्ध तीर्थयात्रियों और छात्रों के 31 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल का पहला जत्था जल्द ही भारत की यात्रा पर आएगा। इस यात्रा को दोनों देशों के बीच सदियों पुराने धार्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक संबंधों को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
शंघाई में भारत के महावाणिज्य दूत प्रतीक माथुर ने इस संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि प्रतिनिधिमंडल भारत के कई प्रमुख बौद्ध और ऐतिहासिक स्थलों का दौरा करेगा। प्रस्तावित यात्रा कार्यक्रम में वाराणसी, बोधगया, राजगीर और नालंदा जैसे महत्वपूर्ण केंद्र शामिल हैं, जो बौद्ध धर्म और प्राचीन भारतीय शिक्षा परंपरा से गहराई से जुड़े रहे हैं।
माथुर ने सोमवार को यांगझोऊ स्थित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हब में मौजूद ऐतिहासिक सियुन मठ के प्रमुख एबाट शी झोंगशान के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने प्रतिनिधिमंडल को नालंदा के पुनर्निर्माण और जीर्णोद्धार कार्यों को करीब से देखने और समझने के लिए विशेष रूप से आमंत्रित किया।
उन्होंने कहा कि नालंदा आज केवल एक ऐतिहासिक स्थल नहीं, बल्कि भारत और चीन के बीच ज्ञान, शिक्षा और सांस्कृतिक संबंधों का जीवंत प्रतीक बन चुका है। नालंदा परिसर में स्थित जुआनजांग मेमोरियल हॉल और अपनी तरह के अनोखे नेट-ज़ीरो ग्रीन नालंदा यूनिवर्सिटी कैंपस को दोनों देशों के बीच सदियों पुराने बौद्ध संबंधों और शैक्षणिक आदान-प्रदान के महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के सांस्कृतिक और धार्मिक आदान-प्रदान कार्यक्रम भारत और चीन के लोगों के बीच आपसी समझ और संपर्क को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। साथ ही, यह पहल दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक बौद्ध विरासत को नई पीढ़ियों तक पहुंचाने का भी माध्यम बनेगी।
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