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रेप केस के आरोपी जज संभाल रहे POCSO कोर्ट की जिम्मेदारी, सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद HC से मांगा जवाब

न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता और न्यायिक अधिकारियों की जवाबदेही से जुड़ा एक अहम मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। रेप केस में आरोपी एक अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के POCSO कोर्ट में जिम्मेदारी संभालने पर सवाल उठाए गए हैं। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट प्रशासन और संबंधित न्यायिक अधिकारी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

मामला उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त जिला न्यायाधीश अशोक भारतेन्दु से जुड़ा है। उनके खिलाफ दिल्ली में वर्ष 2022 में दुष्कर्म का मामला दर्ज हुआ था। आरोप लगाने वाली महिला ने दावा किया था कि न्यायिक अधिकारी ने शादी का झूठा वादा करके उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। हालांकि, इन आरोपों पर अंतिम न्यायिक फैसला अभी नहीं आया है।

सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका शिकायतकर्ता महिला की ओर से दाखिल की गई है। महिला की मांग है कि जब तक उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले की सुनवाई लंबित है, तब तक संबंधित न्यायिक अधिकारी को POCSO कोर्ट की जिम्मेदारी से हटाया जाए।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि POCSO कोर्ट में बच्चों के साथ यौन अपराधों से जुड़े संवेदनशील मामलों की सुनवाई होती है।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील राकेश कुमार सिंह ने दलील दी कि दुष्कर्म के मामले में आरोपी होने और अदालत द्वारा मामले का संज्ञान लिए जाने के बावजूद संबंधित न्यायिक अधिकारी POCSO कोर्ट में अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

याचिकाकर्ता ने कहा कि न्यायिक अधिकारी को निलंबित करने की मांग नहीं की जा रही, लेकिन कम से कम उन्हें POCSO कोर्ट के न्यायिक कार्यों से अलग किया जाना चाहिए।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि शिकायतकर्ता की शिकायत और विजिलेंस जांच की प्रगति को लेकर भी सवाल हैं। कोर्ट इस बात की जांच करना चाहता है कि हाई कोर्ट में चल रही विजिलेंस जांच किस चरण में है और शिकायत पर अब तक क्या कार्रवाई हुई है।

पीठ ने स्पष्ट किया कि संबंधित न्यायिक अधिकारी को न्यायिक जिम्मेदारियों से हटाने का फैसला इलाहाबाद हाई कोर्ट प्रशासन को लेना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट प्रशासन और संबंधित न्यायिक अधिकारी को नोटिस जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई 11 दिसंबर को निर्धारित की गई है।

क्या है पूरा मामला?

दरअसल, शिकायतकर्ता महिला ने 8 दिसंबर 2022 को दिल्ली के मयूर विहार फेज-1 पुलिस स्टेशन में संबंधित न्यायिक अधिकारी के खिलाफ FIR दर्ज कराई थी। महिला का आरोप था कि उनकी मुलाकात एक मैट्रिमोनियल वेबसाइट के जरिए हुई थी और शादी का वादा करके उनके साथ दुष्कर्म किया गया।

इसके बाद दिल्ली पुलिस ने जांच की और चार्जशीट दाखिल की। मामले में दिल्ली की अदालत ने भी आरोपों का संज्ञान लिया। वहीं, संबंधित न्यायिक अधिकारी ने FIR को चुनौती देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया था।

उधर, शिकायतकर्ता महिला ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में भी याचिका दाखिल की थी, लेकिन हाई कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद महिला ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

अब सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद इस मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट का जवाब महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी न्यायिक अधिकारी को पद से हटाने का अंतिम आदेश नहीं दिया है और उनके खिलाफ लगे आरोपों पर भी कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला है।

यह मामला एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि संवेदनशील यौन अपराधों की सुनवाई करने वाली अदालतों में नियुक्तियों को लेकर न्यायिक संस्थाओं की जवाबदेही और पारदर्शिता किस तरह सुनिश्चित की जानी चाहिए।

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