दीपावली के त्योहार पर घरों और आंगनों को रोशन करने के लिए बाजारों में मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ने लगी है। इन दीयों के निर्माण के पीछे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की उन महिलाओं की मेहनत भी शामिल है, जो अपने पारंपरिक हुनर को आजीविका का जरिया बना रही हैं। उनके लिए मिट्टी के दीये बनाना केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर करने का माध्यम भी है।
धौरहरा विकासखंड में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं मिट्टी के दीये, बर्तन और देवी-देवताओं की मूर्तियां तैयार कर रही हैं। हाथों से बनाए गए इन उत्पादों को बाजार में बेचकर महिलाएं त्योहार के दौरान अतिरिक्त आमदनी जुटाने की कोशिश कर रही हैं।
देवी प्रेरणा स्वयं सहायता समूह की लक्ष्मी देवी, रेखा देवी, सावित्री उर्फ रामा, सुभासनी, बिटियन, गीता देवी, संनीता देवी, देवकला सहित अन्य महिलाएं मिट्टी के बर्तन बनाने की पारंपरिक कला को आगे बढ़ा रही हैं। वहीं, सीता प्रेरणा समूह की फूलमती भी इस काम के जरिए अपनी आजीविका को मजबूत बनाने में जुटी हैं।
आर्थिक चुनौतियों और सीमित संसाधनों के बावजूद ये महिलाएं मेहनत से मिट्टी को अलग-अलग आकार देकर दीये, बर्तन और सजावटी वस्तुएं तैयार कर रही हैं। घरेलू जिम्मेदारियों के साथ इस काम को संभालते हुए उन्हें उम्मीद है कि दीपावली के अवसर पर उनके उत्पादों की बिक्री बढ़ेगी और परिवार की आय में इजाफा होगा।
आजीविका गतिविधियों को बढ़ावा देने पर जोर
स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से आजीविका संबंधी गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। धौरहरा क्षेत्र की महिलाएं अपने पारंपरिक कौशल का इस्तेमाल कर मिट्टी के दीये और अन्य उत्पाद तैयार कर रही हैं। इससे उन्हें अपनी कला को रोजगार से जोड़ने का अवसर मिल रहा है।
दीपावली के दौरान इन उत्पादों की बिक्री महिलाओं के लिए अतिरिक्त कमाई का माध्यम बन सकती है। प्रयास किया जा रहा है कि स्वयं सहायता समूहों द्वारा तैयार किए गए उत्पादों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराया जाए, ताकि उनकी बिक्री बढ़े और महिलाओं की आमदनी में सुधार हो सके।






