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कैंसर की दवाओं पर मुनाफे का खेल! 30% से बढ़कर 700% तक पहुंचा मार्जिन, आंकड़ों ने उड़ाए होश

कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों और उनके परिवारों के लिए इलाज का खर्च पहले से ही एक बड़ी चुनौती है। कीमोथेरेपी, इम्यूनोथेरेपी और दूसरी महंगी दवाओं के बीच अब दवाओं के मुनाफे को लेकर सामने आए आंकड़ों ने नई चिंता खड़ी कर दी है। दावा किया जा रहा है कि कैंसर की दवाओं पर साल 2019 में जहां अधिकतम 30 प्रतिशत तक मार्जिन कैप की व्यवस्था थी, वहीं अब कुछ दवाओं पर मार्जिन 700 प्रतिशत तक पहुंच गया है।

यह आंकड़ा इसलिए भी चौंकाने वाला है, क्योंकि कैंसर का इलाज लंबे समय तक चल सकता है। कई मरीजों को नियमित रूप से महंगी दवाएं खरीदनी पड़ती हैं। ऐसे में दवाओं की कीमत और उनके वास्तविक खरीद मूल्य के बीच बड़ा अंतर मरीजों के परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ा सकता है।

दवाओं की कीमत और मुनाफे पर सवाल

दवा बाजार में निर्माता, वितरक, थोक विक्रेता और खुदरा विक्रेता जैसे कई स्तर होते हैं। हर स्तर पर कीमत में अंतर आ सकता है। लेकिन जब किसी दवा का मार्जिन कई गुना बढ़ने की बात सामने आती है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर मरीज जिस दवा के लिए हजारों या लाखों रुपये खर्च कर रहा है, उसकी वास्तविक लागत कितनी है?

2019 के फैसले के बाद भी क्यों बढ़ा मार्जिन?

दरअसल, फरवरी 2019 में राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण यानी NPPA ने 42 चुनिंदा गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर 30 प्रतिशत ट्रेड मार्जिन की सीमा तय की थी। इस फैसले के बाद 526 ब्रांड की दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य यानी MRP में कमी आई थी। कुछ दवाओं की कीमतों में 90 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई थी। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस कदम से मरीजों को सालाना करीब 984 करोड़ रुपये की अनुमानित बचत हुई थी।
लेकिन अब 2026 में सामने आए आंकड़े बताते हैं कि पुराने फैसले का असर लंबे समय तक कायम नहीं रह सका। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, 2019 की सूची में शामिल 42 दवाओं में से 34 दवाएं 2026 की नई सूची में भी शामिल हैं। इनमें से कई दवाओं पर 100 से 700 प्रतिशत से अधिक तक का मार्क-अप दर्ज किया गया।

700 प्रतिशत मार्क-अप का क्या है मतलब?

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। 700 प्रतिशत मार्क-अप और 700 प्रतिशत ट्रेड मार्जिन एक ही बात नहीं है। मार्क-अप की गणना स्टॉकिस्ट को मिलने वाली कीमत के आधार पर होती है, जबकि ट्रेड मार्जिन की गणना अंतिम MRP के आधार पर की जाती है। इसलिए इन आंकड़ों को सीधे 700 प्रतिशत मुनाफा कहना सही नहीं होगा।

ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क ने इन आंकड़ों के आधार पर सवाल उठाया है कि केवल एक बार MRP कम करने से मरीजों को स्थायी राहत नहीं मिल सकती। संगठन का मानना है कि दवाओं के ट्रेड मार्जिन पर लगातार निगरानी और प्रभावी नियंत्रण जरूरी है।

सरकार ने 137 कैंसर दवाओं पर लिया नया फैसला

बढ़ते मार्जिन और मरीजों पर पड़ रहे आर्थिक बोझ के बीच सरकार ने अक्टूबर 2026 में बड़ा कदम उठाया है। NPPA ने 137 कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को अधिकतम खुदरा मूल्य यानी MRP के 30 प्रतिशत तक सीमित करने का फैसला किया है। इस सूची में कई महत्वपूर्ण कैंसर की दवाएं शामिल हैं।

सरकार को उम्मीद है कि इस फैसले से कुछ दवाओं की कीमतों में 20 से 70 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। NPPA के अनुमान के मुताबिक, इस कदम से मरीजों को सालाना लगभग 2,500 करोड़ रुपये की बचत हो सकती है। नई कीमतें 9 नवंबर 2026 से लागू होंगी।

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