आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के प्रमुख वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी ने वर्ष 2023 में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून का समर्थन करने को लेकर अफसोस जताया है। उन्होंने स्वीकार किया कि उस समय इस कानून का समर्थन करना उनकी गलती थी। उनके इस बयान के बाद चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया और कानून को लेकर राजनीतिक चर्चा फिर तेज हो गई है।
दरअसल, वर्ष 2023 में केंद्र सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल से संबंधित कानून बनाया था। इस कानून के तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक चयन समिति का प्रावधान किया गया। समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री की ओर से नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं।
इससे पहले, वर्ष 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा था कि संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की समिति की सलाह पर की जाएगी। इसके बाद संसद ने नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर नया कानून पारित किया। नए कानून में भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को चयन समिति में शामिल किया गया।
इस बदलाव को लेकर विपक्षी दलों ने सवाल उठाए थे। उनका तर्क रहा है कि चयन समिति में सरकार के दो प्रतिनिधियों की मौजूदगी से नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार का प्रभाव बढ़ सकता है। वहीं, कानून के समर्थकों का पक्ष रहा है कि संसद को नियुक्ति प्रक्रिया के लिए कानूनी ढांचा तैयार करने का अधिकार है।
जगन मोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआर कांग्रेस ने वर्ष 2023 में इस कानून के समर्थन में रुख अपनाया था। अब इस फैसले पर अफसोस जताते हुए रेड्डी ने संकेत दिया है कि उस समय लिया गया राजनीतिक निर्णय सही नहीं था।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनाव आयोग देश में लोकसभा, विधानसभा और अन्य चुनावों के संचालन की संवैधानिक जिम्मेदारी निभाता है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता और उसकी नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक दलों के बीच लंबे समय से बहस होती रही है।
हालांकि, चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित कानून और उसके प्रावधानों पर राजनीतिक मतभेद बने हुए हैं। इस पूरे विवाद में एक पक्ष नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार के प्रभाव को लेकर सवाल उठाता है, जबकि दूसरा पक्ष संसद द्वारा निर्धारित कानूनी व्यवस्था का समर्थन करता है।
जगन मोहन रेड्डी का यह बयान उनके पहले के राजनीतिक रुख पर पुनर्विचार के रूप में देखा जा रहा है। अब इस मुद्दे पर आगे उनकी पार्टी क्या रुख अपनाती है और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बहस किस दिशा में बढ़ती है, इस पर नजर रहेगी।
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