देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया और मौलिक अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि शीघ्र सुनवाई का अधिकार संविधान के तहत मिलने वाला मौलिक अधिकार है और किसी भी कानून या नियम को संविधान से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, संविधान देश का सर्वोच्च कानूनी दस्तावेज है। संसद और राज्य विधानसभाओं द्वारा बनाए गए कानूनों की व्याख्या भी संवैधानिक मूल्यों और मौलिक अधिकारों को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए।
अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को न्याय मिलने में अनावश्यक देरी उसके मौलिक अधिकारों के सवाल को जन्म देती है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सुनिश्चित किया गया है। इसी अधिकार के दायरे में निष्पक्ष और समयबद्ध सुनवाई भी शामिल है।
सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई फैसलों में स्पष्ट कर चुका है कि मुकदमे की शीघ्र सुनवाई केवल आरोपी का अधिकार नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक हित से भी जुड़ा हुआ है। जांच से लेकर सुनवाई, अपील और पुनर्विचार तक न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए।
इस टिप्पणी का व्यापक महत्व इसलिए भी है, क्योंकि देश की अदालतों में बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं। लंबे समय तक मुकदमों का निपटारा नहीं होने से विचाराधीन कैदियों और न्याय की प्रतीक्षा कर रहे लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से एक बार फिर यह संदेश सामने आया है कि कानून का उद्देश्य संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना है, न कि उन्हें कमजोर करना। न्यायिक प्रक्रिया में निष्पक्षता, पारदर्शिता और समयबद्ध सुनवाई संविधान की मूल भावना का हिस्सा हैं।
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