इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने कोडीनयुक्त कफ सिरप के कथित अवैध कारोबार से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बलरामपुर के थोक दवा विक्रेता वरुण लाठ को राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने उनकी जमानत अर्जी खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि केवल दवा बिक्री का लाइसेंस होने से किसी व्यक्ति को NDPS Act के तहत कार्रवाई से छूट नहीं मिल सकती।
न्यायमूर्ति राजीव भारती की अवकाशकालीन एकल पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि यदि किसी लाइसेंसधारी दवा विक्रेता द्वारा नियंत्रित दवाओं की बिक्री और वितरण से संबंधित नियमों का पालन नहीं किया जाता है तथा रिकॉर्ड में गंभीर अनियमितताएं पाई जाती हैं, तो उसके खिलाफ एनडीपीएस अधिनियम के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
यह मामला बलरामपुर जिले के तुलसीपुर थाना क्षेत्र में दर्ज एक मुकदमे से जुड़ा हुआ है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (FSDA) के निर्देश पर अशोक मेडिकल स्टोर का निरीक्षण किया गया था। जांच के दौरान अधिकारियों को कोडीन आधारित कोडीवा कफ सिरप की खरीद और बिक्री से संबंधित दस्तावेजों में कई गंभीर खामियां मिलीं।
जांच एजेंसियों का आरोप है कि मेडिकल स्टोर और उससे जुड़े सप्लाई नेटवर्क द्वारा बड़ी मात्रा में कोडीनयुक्त कफ सिरप की बिक्री की गई, लेकिन संबंधित बिक्री रिकॉर्ड, स्टॉक रजिस्टर और अन्य आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए। इससे संदेह पैदा हुआ कि दवा का उपयोग वैध चिकित्सा उद्देश्यों के बजाय अवैध रूप से किया जा रहा था।
अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि जांच में यह भी संकेत मिले हैं कि कफ सिरप की सप्लाई और वितरण एक बड़े एवं संगठित नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है। अधिकारियों को आशंका है कि दवा का डायवर्जन कर उसे नशे के रूप में इस्तेमाल करने वाले लोगों तक पहुंचाया जा रहा था। इसी आधार पर मामले में एनडीपीएस अधिनियम के प्रावधान लागू किए गए।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष की ओर से तर्क दिया गया कि आरोपी के पास वैध थोक दवा बिक्री लाइसेंस है और वह कानूनी रूप से दवा कारोबार से जुड़ा हुआ है। हालांकि अदालत ने इस दलील को पर्याप्त नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि लाइसेंसधारी होने का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति रिकॉर्ड संधारण और नियामकीय प्रावधानों के पालन से मुक्त हो जाता है।
अदालत ने यह भी माना कि जांच के दौरान सामने आए तथ्यों और रिकॉर्ड में कथित अनियमितताओं को देखते हुए प्रथम दृष्टया मामला गंभीर प्रतीत होता है। ऐसे में आरोपी को जमानत देने से जांच और अभियोजन की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, कोडीन आधारित कफ सिरप का दुरुपयोग लंबे समय से कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। चिकित्सकीय उपयोग के लिए निर्धारित इस दवा का कई बार नशे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, जिसके चलते इसके भंडारण, बिक्री और वितरण पर कड़ी निगरानी रखी जाती है।
हाई कोर्ट के इस फैसले को नियंत्रित दवाओं के अवैध कारोबार के खिलाफ सख्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है। कानूनी जानकारों का मानना है कि अदालत ने अपने आदेश के माध्यम से स्पष्ट किया है कि लाइसेंसधारी दवा विक्रेताओं को भी नियामकीय नियमों और रिकॉर्ड संधारण संबंधी प्रावधानों का पूर्ण पालन करना होगा। यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता या अवैध गतिविधि के संकेत मिलते हैं तो उनके खिलाफ भी कठोर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।








