करीब चार वर्षों से जारी रूस-यूक्रेन युद्ध और इस वर्ष फरवरी में अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमले के बाद मध्य-पूर्व में बढ़े तनाव के बीच वैश्विक राजनीति एक नए मोड़ पर पहुंचती दिख रही है। इसी बीच अमेरिका में यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की मुलाकात ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।
अब तक दोनों युद्ध अलग-अलग क्षेत्रीय संघर्ष माने जा रहे थे, लेकिन वॉशिंगटन में दोनों नेताओं की मौजूदगी और मुलाकात के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या वैश्विक शक्ति समीकरण एक नए दौर में प्रवेश कर रहे हैं।
वॉशिंगटन में हुई अहम मुलाकात
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू लगभग एक ही समय पर अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन पहुंचे। दोनों नेता दिवंगत अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम के अंतिम संस्कार में शामिल होने पहुंचे थे।
लिंडसे ग्राहम अमेरिका की विदेश नीति में ईरान के खिलाफ सख्त रुख के समर्थक माने जाते थे। साथ ही उन्होंने रूस के खिलाफ यूक्रेन की रणनीति का भी लगातार समर्थन किया था। ऐसे में दोनों नेताओं की मुलाकात को केवल औपचारिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं माना जा रहा है।
क्या बदल रहे हैं वैश्विक समीकरण?
विशेषज्ञों का मानना है कि जेलेंस्की और नेतन्याहू की मुलाकात ऐसे समय में हुई है, जब रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य-पूर्व का संघर्ष वैश्विक सुरक्षा पर व्यापक असर डाल रहे हैं।
इस बैठक के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या दोनों देश भविष्य में अपने साझा रणनीतिक हितों को लेकर अधिक समन्वय स्थापित करेंगे या यह मुलाकात केवल कूटनीतिक शिष्टाचार तक सीमित रहेगी। हालांकि, इस संबंध में किसी भी तरह की आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है।
व्हाइट हाउस बना दो बड़े संघर्षों का केंद्र
वॉशिंगटन में दोनों नेताओं की मौजूदगी ने अमेरिका को एक साथ दो बड़े अंतरराष्ट्रीय संघर्षों के केंद्र में ला खड़ा किया है। विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन और मध्य-पूर्व की परिस्थितियां अब पहले की तुलना में अधिक परस्पर जुड़ी हुई दिखाई दे रही हैं।
इसी कारण यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या भविष्य में इन संघर्षों का प्रभाव एक-दूसरे पर और अधिक पड़ सकता है, या फिर ये अलग-अलग मोर्चों तक ही सीमित रहेंगे।
क्या दुनिया 1914 जैसी स्थिति की ओर बढ़ रही है?
कुछ इतिहासकारों और कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान वैश्विक हालात प्रथम विश्व युद्ध से पहले वर्ष 1914 की परिस्थितियों की याद दिलाते हैं। उनके अनुसार, अलग-अलग क्षेत्रीय संकट, देशों के बीच बनते गठबंधन, बढ़ता तनाव और गलत रणनीतिक आकलन भविष्य में बड़े वैश्विक टकराव का जोखिम बढ़ा सकते हैं।
हालांकि, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, कूटनीतिक संवाद और वैश्विक संस्थाएं किसी भी व्यापक संघर्ष को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। ऐसे में जेलेंस्की और नेतन्याहू की मुलाकात को फिलहाल कूटनीतिक घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है, जबकि इसके संभावित प्रभावों पर दुनिया की नजर बनी हुई है।








