देश में डेटा प्राइवेसी और नागरिकों की निजी जानकारी की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। केंद्र सरकार ने प्राइवेसी कानून में संभावित बदलाव के संकेत दिए हैं। सरकार की ओर से कहा गया है कि अगर मौजूदा प्रावधानों में संशोधन की जरूरत महसूस होती है, तो इस दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं। इतना ही नहीं, जरूरत पड़ने पर कानून को रद्द करने का विकल्प भी खुला रखा गया है।
इस बयान के बाद डिजिटल अधिकारों, नागरिकों की निजता और सरकारी निगरानी से जुड़े मुद्दों पर नई चर्चा शुरू हो गई है।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, मामला डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन यानी DPDP एक्ट, 2023 से जुड़ा है। इस कानून का उद्देश्य लोगों की निजी डिजिटल जानकारी को सुरक्षित रखना और कंपनियों तथा संस्थाओं को व्यक्तिगत डेटा के इस्तेमाल के लिए जवाबदेह बनाना है।
हालांकि, इस कानून के कुछ प्रावधानों को लेकर मीडिया संस्थानों और पत्रकार संगठनों ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि कानून में पत्रकारिता और खोजी खबरों के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से स्वतंत्र पत्रकारिता प्रभावित हो सकती है।
मीडिया संस्थानों ने सुप्रीम कोर्ट में उठाए सवाल
डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन यानी DNPA ने इस कानून और इससे जुड़े नियमों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। इस संगठन में देश के 21 प्रमुख न्यूज पब्लिशर्स शामिल हैं।
याचिका में कहा गया है कि कानून के कुछ प्रावधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सूचना के अधिकार को प्रभावित कर सकते हैं। खासतौर पर खोजी पत्रकारिता, गोपनीय सूत्रों और सार्वजनिक हित से जुड़ी खबरों को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 17 नवंबर को निर्धारित है।
आईटी मंत्रालय ने क्या कहा?
टाइम्स ऑफ इंडिया की 31 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि DPDP एक्ट के प्रावधान मुख्य रूप से डेटा फिड्यूशियरी यानी व्यक्तिगत डेटा को नियंत्रित और प्रोसेस करने वाली संस्थाओं पर लागू होते हैं।
अधिकारियों का कहना है कि पत्रकार और मीडिया संस्थान इस श्रेणी में नहीं आते। इसके बावजूद यदि पत्रकारिता को लेकर कोई आशंका है, तो सरकार नियमों में संशोधन कर सकती है। जरूरत पड़ने पर कानून में भी बदलाव किया जा सकता है।
सरकार का कहना है कि वह पत्रकारिता की स्वतंत्रता को प्रभावित नहीं करना चाहती और संविधान में मिले अभिव्यक्ति के अधिकार की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।
आगे क्या हो सकता है?
अब इस पूरे मामले में दो महत्वपूर्ण पहलू सामने हैं। पहला, सरकार पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट देने के उद्देश्य से DPDP एक्ट के नियमों में बदलाव करती है या नहीं। दूसरा, सुप्रीम कोर्ट इस कानून के विवादित प्रावधानों पर क्या फैसला सुनाता है।
फिलहाल सरकार ने संशोधन का विकल्प खुला रखा है। ऐसे में आने वाले दिनों में डिजिटल प्राइवेसी कानून और प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर बड़ा फैसला देखने को मिल सकता है।
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