टाटा समूह में चेयरमैन पद को लेकर एक बार फिर मतभेद सामने आए हैं। Tata Sons के बोर्ड ने एन. चंद्रशेखरन को पांच साल के एक और कार्यकाल के लिए कार्यकारी चेयरमैन बनाए रखने को मंजूरी दे दी है। हालांकि, Tata Trusts के चेयरमैन नोएल टाटा ने इस फैसले का विरोध किया। बोर्ड में प्रस्ताव के पक्ष में चार निदेशकों ने मतदान किया, जबकि नोएल टाटा ने इसके खिलाफ वोट दिया।
यह घटनाक्रम इसलिए भी अहम है क्योंकि चंद्रशेखरन ने 12 अगस्त 2026 को खुद मौजूदा कार्यकाल खत्म होने के बाद दोबारा चेयरमैन पद के लिए उपलब्ध नहीं रहने की घोषणा की थी। Tata Trusts का कहना है कि उनके इस फैसले को स्वीकार करने के बाद उत्तराधिकारी चुनने की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी थी।
नोएल टाटा ने क्यों जताई आपत्ति?
नोएल टाटा के मुताबिक, चंद्रशेखरन का दोबारा कार्यकाल नहीं लेने का फैसला उनका अपना और स्पष्ट निर्णय था। Tata Trusts ने इसे स्वीकार कर उत्तराधिकारी की तलाश के लिए चयन समिति की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही थी। ऐसे में Trusts का तर्क है कि बाद में इस फैसले को पलटकर दोबारा नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू नहीं की जानी चाहिए थी।
नोएल टाटा ने यह भी सवाल उठाया कि चंद्रशेखरन के Tata Sons के निदेशक पद की स्थिति स्पष्ट हुए बिना चेयरमैन के तौर पर उनकी पुनर्नियुक्ति पर फैसला कैसे किया जा सकता है। उनके अनुसार, पहले निदेशक पद से जुड़ा मुद्दा सुलझना चाहिए था।
Tata Trusts ने फैसले को बताया कानूनी तौर पर अमान्य
Tata Trusts के आधिकारिक बयान के अनुसार, कंपनी के Articles of Association में चेयरमैन की नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति के लिए Trusts के नामित निदेशकों के बहुमत के समर्थन की आवश्यकता है। Trusts का दावा है कि नोएल टाटा के विरोध में मतदान करने के बाद यह जरूरी समर्थन हासिल नहीं हुआ। इसी आधार पर Trusts ने बोर्ड के प्रस्ताव को कानूनी रूप से अमान्य बताया है।
Trusts के मुताबिक, नोएल टाटा ने इस मुद्दे पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की कानूनी राय भी बोर्ड के सामने रखी थी। Trusts का कहना है कि इस राय को बोर्ड ने ध्यान में नहीं लिया।
बोर्ड में कैसे पास हुआ प्रस्ताव?
रिपोर्टों के अनुसार, Tata Sons के बोर्ड में चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के प्रस्ताव पर मत बराबरी की स्थिति में पहुंच गया था। नोएल टाटा ने विरोध किया, जबकि Tata Trusts के दूसरे नामित निदेशक वेंकटचलम श्रीनिवासन ने प्रस्ताव का समर्थन किया। इसके बाद बोर्ड के स्वतंत्र निदेशक की निर्णायक भूमिका से प्रस्ताव पारित हुआ।
हालांकि, Tata Trusts के पास Tata Sons में करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। इसलिए चेयरमैन की पुनर्नियुक्ति का मामला आगे शेयरधारकों की बैठक में भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
विवाद सिर्फ चेयरमैन पद तक सीमित नहीं
चंद्रशेखरन के कार्यकाल को लेकर मतभेद के साथ Tata Sons की लिस्टिंग और कंपनी की नियामकीय स्थिति भी विवाद के केंद्र में है। Reuters के मुताबिक, Tata Trusts और Tata Sons के बीच संभावित लिस्टिंग, Air India के घाटे और अन्य कारोबारी फैसलों को लेकर भी मतभेद रहे हैं।
फिलहाल Tata Trusts ने कहा है कि वह नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया को कंपनी के Articles of Association के अनुसार आगे बढ़ाने के अपने रुख पर कायम है। दूसरी ओर, Tata Sons बोर्ड ने चंद्रशेखरन के पांच साल के नए कार्यकाल को मंजूरी दी है। इस पूरे मामले का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव शेयरधारकों की मंजूरी और संबंधित कानूनी-नियामकीय प्रक्रिया हो सकती है।






